सुरुज बाई खाण्डे जयंती पर उन्हें शत् शत् नमन
आईए उन्हें याद करते हैं जिनका आज जयंती है जिन्होंने छत्तीसगढ़ का नाम भारत के साथ ही साथ विदेशों में भी रौशन किया | आज उनके जन्मदिन पर आप उन्हें अपनी सद्भावना, प्रेम, सम्मान और श्रध्दासुमन समर्पित कर सकते हैं | आज उन्हें कौन नहीं जानता उनका नाम लेना या उनकी जीवनी पर कुछ लिखना या बोलना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है, हम बात कर रहे हैं अन्तर्राष्ट्रीय भरथरी गायिका सुरुज बाई खाण्डे जी का जिन्होंने अपने नाम के अनुरूप ही भरथरी की लोक गायन विधा को एक माता स्वरूप जन्म दिया और विश्व में चद्रमा की शीतलता समान देदीप्यमान किया जिसकी तान सुनते ही लाखों करोड़ों लोग करुण रस की समुद्र में गोंते लगाने लग जाते हैं |
आईए फिर से जानते हैं आपको...
आपका जन्म ग्राम पौंसरी तहसील बिल्हा जिला बिलासपुर में आज ही के दिन 12 जून 1949 को सतनामी समाज के एक कृषक परिवार में हुआ |
आपकी माता का नाम श्रीमती रेवती बाई घृतलहरे एवं पिता का नाम श्री घसिया घृतलहरे था |
आप स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाई लेकिन अपने परिवार से मिले व्यवहारिक शिक्षा और कला में आप दक्ष थीं |
आपका विवाह ग्राम कछार बिलासपुर वाले श्री लखन लाल खाण्डे जी के साथ हुआ, आपने अपनी भरथरी गायन कला की शिक्षा अपने नाना रामसाय टंडन जी से ग्रहण किया |
आप भरथरी गायन व प्रस्तुतिकरण में एक शिध्दहस्त लोक कलाकार थीं और इस विधा की प्रथम महिला गायिका थी |
इस विधा को लेकर आपने छत्तीसगढ़ की धरा से समस्त भारत के साथ-साथ विश्व के लगभग 18 देशों में प्रदर्शन किया जिसमें सोवियत रूस प्रमुख रहा |
आपने सार्वजनिक वृहद मंच में प्रथम प्रस्तुति लगभग 1969-70 में रतनपुर मेले में दिया जिसने आपको प्रसिध्दि के खुले आसमान में उड़ने का अवसर प्रदान किया |
आपकी अंतिम प्रस्तुति 18 दिसम्बर 2017 को गुरु घासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय की सभागार में रहा |
इसके बाद आपने अपने नस्वर शरीर का त्याग 10 मार्च 2018 को कर सदा सदा के लिए अस्त हो गई जो कि भरथरी विधा और समस्त विश्व के लिए एक अपूर्णीय क्षति है | किन्तु आज भी आप अपने भरथरी, ढ़ोला मारू, चंदैनी, आल्हा उदल और सतनाम भजन के माध्यम से हमारी अन्तर्आत्मा में सौंधी-सौंधी महक रही हैं तथा आप हमारे बीच जीवंत हैं |
एक कला एव विधा को जीवंत बनाये रखने के लिए एक कलाकार अपना पूरा जीवन उस कला को समर्पित कर देता है उसे बदले में कुछ नहीं चाहिए रहता बस इतना ही चाहिए रहता है कि उनके महानतम् कार्यों का उचित सम्मान उन्हें मिले |
सुरुज बाई खाण्डे जी को 2001 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा देवी अहिल्या बाई सम्मान, 2006 में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा स्व.देवदास बंजारे स्मृति सम्मान, 2006 में रामचंद्र देशमुख बहुमत सम्मान, भास्कर वुमन ऑफ द ईयर अवार्ड 2010 में और बिसाहू दास महंत एवं चक्रधर सम्मान 2010 में ही मिला किन्तु राजनीति में पहुंच और पहचान न होने की वजह से उन्हें उनका असली हक #पद्मश्रीएवंपद्मभूषण जैसे सम्मान से आज तक सम्मानित नहीं किया गया यह अनुठे लोक विधा की और एक कलाकार के समर्पण का शासन सत्ता के द्वारा उपेक्षा है |

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