भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को प्रचलित है परन्तु तत्कालीन अनेक साक्ष्यों के अनुसार उनका जन्म 27 सितंबर 1907 ई० पंजाब के गाँव बंगा, तहसील जड़ाँवाला, जिला लायलपुर को एक सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक किसान परिवार से थे।
क्रान्तिकारी गतिविधियाँ (Revolutionary Activities)
अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। उस समय भगत सिंह करीब बारह वर्ष के थे जब जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से 12 मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गए। इस उम्र में भगत सिंह अपने चाचाओं की क्रान्तिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्ता सही है कि नहीं ? गांधी जी का असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गान्धी जी के अहिंसात्मक तरीकों और क्रान्तिकारियों के हिंसक आन्दोलन में से अपने लिए रास्ता चुनने लगे। गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने के कारण उनमें थोड़ा रोष उत्पन्न हुआ, पर पूरे राष्ट्र की तरह वो भी महात्मा गाँधी का सम्मान करते थे। पर उन्होंने गाँधी जी के अहिंसात्मक आन्दोलन की जगह देश की स्वतन्त्रता के लिए हिंसात्मक क्रांति का मार्ग अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। उनके दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु इत्यादि थे।
लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। वर्ष 1922 में चौरी-चौरा हत्याकांड के बाद गाँधी जी ने जब किसानों का साथ नहीं दिया तब भगत सिंह बहुत निराश हुए। उसके बाद उनका अहिंसा से विश्वास कमजोर हो गया और वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सशस्त्र क्रांति ही स्वतंत्रता दिलाने का एक मात्र रास्ता है। उसके बाद वह चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में गठित हुई गदर दल के हिस्सा बन गए। काकोरी काण्ड में राम प्रसाद 'बिस्मिल' सहित 4 क्रान्तिकारियों को फाँसी व 16 अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड़ गए और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। इस संगठन का उद्देश्य सेवा, त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था।
भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसम्बर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने वर्तमान नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार संसद भवन में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।
लाला जी की मृत्यु का प्रतिशोध (Vengeance for Lala ji's death)
1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिए भयानक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों में भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज भी किया। इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। अब इनसे रहा न गया। एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को मारने की योजना सोची। सोची गई योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे। उधर जयगोपाल अपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गए जैसे कि वो ख़राब हो गई हो। गोपाल के इशारे पर दोनों सचेत हो गए। उधर चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डी० ए० lवी० स्कूल की चहारदीवारी के पास छिपकर घटना को अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे।
17 दिसंबर 1928 को करीब सवा चार बजे, ए० एस० पी० सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी जिससे वह पहले ही मर जाता। लेकिन तुरन्त बाद भगत सिंह ने भी ३-४ गोली दाग कर उसके मरने का पूरा इन्तज़ाम कर दिया। ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चनन सिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसे सावधान किया - "आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा।" नहीं मानने पर आज़ाद ने उसे गोली मार दी और वो वहीं पर मर गया। इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया।
एसेम्बली में बम फेंकना (Bombing The Assembly)
भगत सिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर नहीं थे परन्तु वे वामपंथी विचारधारा को मानते थे, तथा कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से उनका ताल्लुक था और उन्हीं विचारधारा को वे आगे बढ़ा रहे थे। यद्यपि, वे समाजवाद के पक्के पोषक भी थे। कलान्तर में उनके विरोधी द्वारा उनको अपने विचारधारा बता कर युवाओ को भगत सिंह के नाम पर बरगलाने के आरोप लगते रहे है। कॉंग्रेस के सत्ता में रहने के बावजूद भगत सिंह को काँग्रेस शहीद का दर्जा नही दिलवा पाए, क्योंकि वे केवल भगत सिंह के नाम का इस्तेमाल युवाओं को अपनी पार्टी से जोड़ने के लिए करते थे। उन्हें पूँजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी। उस समय चूँकि अँग्रेज ही सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति उन्नति कर पाये थे, अतः अँग्रेजों के मजदूरों के प्रति अत्याचार से उनका विरोध स्वाभाविक था। मजदूर विरोधी ऐसी नीतियों को ब्रिटिश संसद में पारित न होने देना उनके दल का निर्णय था। सभी चाहते थे कि अँग्रेजों को पता चलना चाहिए कि हिन्दुस्तानी जाग चुके हैं और उनके हृदय में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है। ऐसा करने के लिये ही उन्होंने दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की योजना बनाई थी।
भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा न हो और अँग्रेजों तक उनकी 'आवाज़' भी पहुँचे। हालाँकि प्रारम्भ में उनके दल के सब लोग ऐसा नहीं सोचते थे पर अन्त में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 8 अप्रैल 1929 को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न था, अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। पूरा हाल धुएँ से भर गया। भगत सिंह चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो; अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने हुए थे। बम फटने के बाद उन्होंने "इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद!" का नारा लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिए। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गई और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया।
जेल के दिन(Jail Days)
जेल में भगत सिंह करीब 2 साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करते रहते थे। जेल में रहते हुए भी उनका अध्ययन लगातार जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ? जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने 64 दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।
फाँसी (Mahamitunjaya)
26 अगस्त, 1930 को अदालत ने भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया। 7 अक्तूबर, 1930 को अदालत के द्वारा 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी की सजा सुनाई गई। फाँसी की सजा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर में धारा 144 लगा दी गई। इसके बाद भगत सिंह की फाँसी की माफी के लिए प्रिवी परिषद में अपील दायर की गई परन्तु यह अपील 10 जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई। इसके बाद तत्कालीन काँग्रेस अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय ने वायसराय के सामने सजा माफी के लिए 14 फरवरी, 1931 को अपील दायर की कि वह अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मानवता के आधार पर फांसी की सजा माफ कर दें। भगत सिंह की फाँसी की सज़ा माफ़ करवाने हेतु महात्मा गाँधी ने 17 फरवरी 1931 को वायसराय से बात की फिर 18 फरवरी, 1931 को आम जनता की ओर से भी वायसराय के सामने विभिन्न तर्को के साथ सजा माफी के लिए अपील दायर की। यह सब कुछ भगत सिंह की इच्छा के खिलाफ हो रहा था क्यों कि भगत सिंह नहीं चाहते थे कि उनकी सजा माफ की जाए।
23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई। फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जब उनसे उनकी आखरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और उन्हें वह पूरी करने का समय दिया जाए। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिए! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो।"
फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे।
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला॥
फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आए। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गए। जब गाँव वाले पास आए तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया। और भगत सिंह हमेशा के लिए अमर हो गये। इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गाँधी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे। इस कारण जब गान्धी काँग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झण्डों के साथ गाँधी जी का स्वागत किया। एकाध जग़ह पर गाँधी पर हमला भी हुआ, किन्तु सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने बचा लिया।
व्यक्तित्व
जेल के दिनों में उनके लिखे खतों व लेखों से उनके विचारों का अन्दाजा लगता है। उन्होंने भारतीय समाज में लिपि (पंजाबी की गुरुमुखी व शाहमुखी तथा हिन्दी और अरबी एवं उर्दू के सन्दर्भ में विशेष रूप से), जाति और धर्म के कारण आयी दूरियों पर दुःख व्यक्त किया था। उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग पर किसी भारतीय के प्रहार को भी उसी सख्ती से सोचा जितना कि किसी अंग्रेज के द्वारा किये गये अत्याचार को।
भगत सिंह को हिन्दी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी। उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये। इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था। पं० राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी आत्मकथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे, भगत सिंह ने उनका अक्षरश: पालन किया। उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाये तथा फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये। फाँसी के पहले 3 मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था। आज के युवा भगत सिंह कैसे बन सकते हैं?
उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है?
हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है?
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें।
सारा जहाँ अदू सही, आओ! मुक़ाबला करें॥
इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। चन्द्रशेखर आजाद से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खायी थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखायी।
“किसी ने सच ही कहा है, सुधार बूढ़े आदमी नहीं कर सकते । वे तो बहुत ही बुद्धिमान और समझदार होते हैं। सुधार तो होते हैं युवकों के परिश्रम, साहस, बलिदान और निष्ठा से, जिनको भयभीत होना आता ही नहीं और जो विचार कम और अनुभव अधिक करते हैं ।”~ भगत सिंह
क्या आप कल्पना कर सकते हैं, एक हुकूमत, जिसका दुनिया के इतने बड़े हिस्से पर शासन था, इसके बार में कहा जाता था कि उनके शासन में सूर्य कभी अस्त नहीं होता। इतनी ताकतवर हुकूमत, एक 23 साल के युवक से भयभीत हो गई थी।
ख्याति और सम्मान (Reputation and Respect)
उनकी मृत्यु की ख़बर को लाहौर के दैनिक ट्रिब्यून तथा न्यूयॉर्क के एक पत्र डेली वर्कर ने छापा। इसके बाद भी कई मार्क्सवादी पत्रों में उन पर लेख छपे, पर चूँकि भारत में उन दिनों मार्क्सवादी पत्रों के आने पर प्रतिबन्ध लगा था इसलिए भारतीय बुद्धिजीवियों को इसकी ख़बर नहीं थी। देशभर में उनकी शहादत को याद किया गया।
दक्षिण भारत में पेरियार ने उनके लेख "मैं नास्तिक क्यों हूँ?" पर अपने साप्ताहिक पत्र कुडई आरसू के २२-२९ मार्च १९३१ के अंक में तमिल में सम्पादकीय लिखा। इसमें भगतसिंह की प्रशंसा की गई थी तथा उनकी शहादत को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ऊपर जीत के रूप में देखा गया था।
आज भी भारत और पाकिस्तान की जनता भगत सिंह को आज़ादी के दीवाने के रूप में देखती है जिसने अपनी जवानी सहित सारी जिन्दगी देश के लिये समर्पित कर दी।
भगत सिंह : व्यक्तिगत वीरता और समृद्ध चिंतन का संगम
भगत सिंह को शहीद, महान शहीद और शहीदे आजम का ताज पहना कर हमने उनके व्यक्तिगत योगदान को तो खूब सराहा लेकिन भगत सिंह की मौलिकता, उनके चिंतन और दर्शन की ओर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया। ध्यान से देखें तो भगत सिंह को अक्सर ही इस रूप में अधिक व्याख्यायित किया जाता है कि वो एक आदर्श के लिए जिये और कुर्बान हो गए। मगर उस आदर्श में उपस्थित जीवित सिद्धांत और मौलिक चिंतन की चर्चा कम ही होती है। अकादमिक दायरे से बाहर लोक के परिवेश में भगत सिंह की छवि ऐसी ही रही है। वस्तुत: देशभक्ति अथवा राष्ट्रभक्ति में कोई नवीनता नहीं अगर हम अपने देशवासियों, वंचित व दमित तबकों तथा समुदायों के उत्थान के बारे में नहीं सोचते। भगत सिंह की खासियत केवल यह नहीं थी कि वे अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे। ऐसे तो तमाम लोग लड़े और कुर्बान हुए। पर वे सब भगत सिंह नहीं बन सके। उनकी विशेषता यह भी नहीं थी कि वे सिख थे और मात्र 23 साल की उम्र में शहीद हो गए। इस तरह के भी अनगितनत उदाहरण मिल जाएंगे। पर वे सभी भगत सिंह का दर्जा नहीं पा सके।
भगत सिंह वह शख्सियत थे जो सिर्फ और सिर्फ भगत सिंह ही हो सकते थे। देखिए उनका जीवन कितना विविधताओं से भरा हुआ था। भगत सिंह अपनी कुल परंपरा से एक जाट सिख परिवार में जन्मे। पर उनके दादा वह शख्सियत थे, जो स्वामी दयानंद और उनके आर्य समाज आंदोलन को पंजाब में लाए थे। आर्य समाज उन दिनों सामाजिक बुराइयों के विरुद्घ तीव्रता से लड़ रहा था। इसलिए भगत सिंह को अपने दादा के संस्कार मिले। उनके दादा ने उनके यज्ञोपवीत के समय कह दिया था कि मेरा यह पोता कुछ बड़ा काम करेगा। उनके चाचा गदर पार्टी से जुड़े थे और अपने क्षेत्र में वे एक अन्य सिख जमींदार के जुल्म के विरुद्घ किसानों को एकजुट करने में लगे थे। भगत सिंह की शिक्षा-दीक्षा लाहौर के खालसा स्कूल में न होकर दयानंद एंग्लो वैदिक (डीएवी) हाई स्कूल में हुई।
जब वे डीएवी हाई स्कूल में दाखिला लेने लाहौर आए अमृतसर में जलियांवाला हत्याकांड हो गया। तब किशोर भगत सिंह मात्र 12 साल के थे। उनके किशोर मन ने कुछ तय कर लिया। हाई स्कूल करने के बाद वे नेशनल कालेज लाहौर पहुँचे। इसी बीच उन्होंने पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन की एक निबंध प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और पंजाब के किसानों की दुर्दशा पर लेख लिखकर पहला पुरस्कार जीता। निराला जी के मतवाला पत्र में उन्होंने एक लेख लिखा कि पंजाबी की लिपि गुरुमुखी नहीं देवनागरी होनी चाहिए। इसके बाद भारत नौजवान सभा का गठन हुआ और भगत सिंह धीरे-धीरे हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी एसोसिएशन के संपर्क में आए। राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्र शेखर आजाद और अशफाक उल्ला खां से उनका संवाद होने लगा। उन्हीं दिनों साइमन कमीशन का विरोध करते हुए शेरे पंजाब लाला लाजपत राय पुलिस की लाठियों से मारे गए। इन जोशीले युवकों ने इसके बाद सांडर्स वध किया और पुलिस से बचने के लिए भगत सिंह दाढ़ी-मूँछ व केश कटवा कर सफाचट हो गए और ये सारे लोग कानपुर आ गए। भगत सिंह का अतीत जान कर उन्हें छुपाने की नीयत से कानपुर के बड़े कांग्रेसी नेता और प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने उन्हें अपने अखबार प्रताप में सब एडिटर रख लिया। बाद में काकोरी डकैती कांड से लेकर तमाम जोशीले कांड इन युवकों ने किए। मगर इसके बाद ही भगत सिंह को समझ में आ गया कि अकेले-अकेले कुछ दुस्साहसिक वारदात कर न तो अंग्रेजों को देश से चलता किया जा सकता है न देश में कोई न्यायसंगत, विधि सम्मत व्यवस्था लागू की जा सकती है।
भगत सिंह ने इस बीच कानपुर में मेस्टन रोड स्थित गया प्रसाद लायब्रेरी में नियमित जाना शुरू किया और प्रिंस क्रोपाटकिन का अराजकता वाद तथा मार्क्स, लेनिन व एंगेल्स को पढ़ा। भगत सिंह का पूरा चिंतन ही बदल गया और उन्होंने पहला काम किया कि हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी एसोसिएशन का नाम बदला और उसमें सोशलिस्ट शब्द जुड़वाया। चंद्र शेखर आजाद की सांगठनिक क्षमता को देखते हुए उन्हें इसका डिक्टेटर नियुक्त किया और शुरू कर दी एक नए किस्म की लड़ाई, जिसके तहत एसेंबली बम कांड किया। वे चाहते तो दिल्ली की तत्कालीन नेशनल एसेंबली में बम फोड़कर भाग सकते थे पर जानबूझकर उन्होंने स्वयं को गिरफ्तार करवाया और इसके बाद जो जिरह उन्होंने की वह उनकी थाती बन गई। इसीलिए मेरा मानना है कि भगत सिंह की जितनी जरूरत कल थी उससे अधिक आज है। आजादी के बाद सिर्फ शासक बदले। गोरे अंग्रेज गए तो काले आ गए मगर व्यवस्था आज भी उसी तरह अन्यायपूर्ण है। गरीब, वंचित और दमित तबका आज भी उपेक्षित है। इसीलिए भगत सिंह मृत्युंजय हैं। मृत्युंजय यानी मृत्यु को जीतने वाला। भगत सिंह एक दर्शन हैं, विचारधारा हैं और वे कभी मरा नहीं करते। अगर किसी के जीवन का लक्ष्य इतना ही हो कि एक समृद्ध आर्थिक जीवन जी लिया जाए तो तो फिर भगत सिंह उनके किसी काम नहीं आने वाले। एक व्यापक समतामूलक समाज के निर्माण में भागीदारी करने की इच्छा रखे बिना भगत सिंह के सपने को पूरा नहीं किया जा सकता। भगत सिंह को समझना है तो आपकी तरुणाई के कुछ सपने होने चाहिए, राष्ट्रीय उत्थान का जज्बा होना चाहिए। आज जब हम भगत सिंह को याद कर रहे हैं तो उनके व्यक्तिगत बलिदान के साथ-साथ उनके सिद्धांतों और विचारों को भी याद करें।
SAHARA BHARAT में विजिट करने के लिए धन्यवाद ।
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